राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पु.श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर महान राष्ट्रयोगी, असामान्य महापुरुष, देशभक्त थे। श्री गुरूजी द्वारा प्रदत्त महान विचार पुंज तेजस्वी भारत राष्ट्र की परिकल्पना की सृष्टि करता है। श्री गुरुजी ने सदैव देशहित में स्वदेशी चेतना स्वदेशी, व्रत स्वदेशी जीवन पद्धति, भारतीय वेशभूषा तथा सुसंस्कार की भावना का समाज के समक्ष प्रकटीकरण किया। गुरु गोलवलकर भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्तम्भ थे। श्री गुरूजी का अध्ययन व चिंतन इतना सर्वश्रेष्ठ था कि वे देश भर के युवाओं के लिए ही प्रेरक पुंज नहीं बने, अपितु पूरे राष्ट्र के प्रेरक पुंज व दिशा निर्देशक हो गये थे। वे युवाओं को ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रेरित करते रहते थे। युवा शक्ति अपनी क्षमता का एक एक क्षण दांव पर लगाती हैं। अतः मैं आग्रह करता हूं कि स्वयं प्रसिद्धि संपत्ति एवं अधिकार की अभिलाषा देश की वेदी पर न्योछावर कर दें। गुरूजी युवाओं को विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण न करने के लिए भी प्रेरित करते थे।
जब कभी भारत की एकता, अखण्डता की बात होगी, तब-तब गुरूजी की राष्ट्रजीवन में किये गये योगदान की चर्चा अवश्य होगी। चाहे स्वतंत्रता के बाद कश्मीर विलय हो या फिर अन्य कोई महत्वपूर्ण प्रकरण। श्री गुरूजी को राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की भारी चिंता लगी रहती थी। उनके अनुसार भारत कर्मभूमि, धर्मभूमि और पुण्यभूमि है। यहां का जीवन विश्व के लिए आदर्श है। भारत राज्य नहीं राष्ट्र है। राष्र्ट्र बनाया नहीं गया, अपितु यह तो सनातन राष्ट्र है। श्री गुरूजी की आध्यात्मिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि ध्यान इत्यादि के माध्यम से उन्हें आने वाले संकटों का आभास भी हो जाता था। श्री गुरूजी निरंतर राष्ट्र श्रद्धा के प्रतीकों का मान, रक्षण करते रहे। वे अंग्रेजी तिथि के स्थान पर हिंदी तिथि के प्रयोग को स्वदेशीकरण का आवश्यक अंग मानते थे। उनकी प्रेरणा से सम्भवतः सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐसा ही कोई क्षेत्र छूटा हो, जहां संघ के अनुशांगिक संगठनों का प्रादुर्भाव न हुआ हो। श्री गुरूजी का प्रारम्भ से ही आध्यात्मिक स्वभाव होने के कारण सन्तों के श्री चरणों में बैठना, ध्यान लगाना, प्रभु स्मरण करना, संस्कृत व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करने में उनकी गहरी रूचि थी। श्री गुरूजी का राष्ट्रजीवन में भी अप्रतिम योगदान था। संघ कार्य करते हुए वे निरंतर राष्ट्रचिंतन किया करते थे।