अगस्त क्रांति भारतीय जनता के अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता की परिचायक है-डॉ- श्रीप्रकाश मिश्र

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन का करीब तीन-चार साल का दौर अत्यंत महत्त्वपूर्ण होने के साथ पेचीदा भी था। यह आंदोलन देशव्यापी था जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। 1942 की अगस्त क्रान्ति भारत का राष्ट्रीय आंदोलन अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति संघर्ष की गाथा है। स्वाधीनता आंदोलन के संघर्ष में 1857 का मुक्ति संग्राम उल्लेख्नीय है। इसमें हर वर्ग, जमींदार, मजदूर और किसान, स्त्री और पुरुष, हिंदू और मुसलमान सभी लोगों ने अपनी एकता एवं बहादुरी का परिचय दिया। अगस्त क्रांति  या 1942 के  भारत छोड़ो आंदोलन  को हम भारतीय स्वाधीनता का द्वितीय मुक्ति संग्राम कह सकते हैं जिसके फलस्वरूप 5 वर्ष बाद 1947 में हमें आजादी मिली। अगस्त क्रांति भारतीय जनता के अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता की परिचायक है। अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए चार जुलाई 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि यदि अंग्रेज भारत नहीं छोड़ते हैं, तो उनके खिलाफ व्यापक स्तर पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाए।



गाँधीजी ने हालाँकि अहिंसक रूप से आंदोलन चलाने का आह्नान किया था लेकिन देशवासियों में अंग्रेजों को भगाने का ऐसा जुनून पैदा हो गया कि कई स्थानों पर बम विस्फोट हुए, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई तथा परिवहन और संचार सेवाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया। जगह जगह हड़ताल की गई। कई जगह पर लोगों ने जिला प्रशासन को उखाड़ फेंका। गिरफ्तार किए गए नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जेल तोड़कर मुक्त करा लिया तथा वहाँ स्वतंत्र शासन स्थापित कर दिया। एक तो अंग्रेजों की रीढ़ द्वितीय विश्व युद्ध में टूट रही थी दूसरी ओर भारत छोड़ो आंदोलन उनकी चूलें हिलाने में लगा था। इस आंदोलन से अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए। उन्होंने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और निर्दोष लोगों को गोली से उड़ा दिया तथा देशभर में एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन पूरे जोश के साथ चलता रहा लेकिन गिरफ्तारियों की वजह से कांग्रेस का समूचा नेतृत्व शेष दुनिया से लगभग तीन साल तक कटा रहा। यह क्रांति किसी पार्टी या व्यक्ति का आंदोलन न होकर आम जनता का आंदोलन था जिसका नेतृत्व आम जनता द्वारा ले लिया गया था। राष्ट्रीय एकीकरण देश के समक्ष एक दुखजनक समस्या बन गई है।