हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान का गौरव एवं अस्मिता की परिचायक है-डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

हिन्दी भाषा के द्वारा पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति की संवाहक भाषा है, जिसके जरिए व्यक्ति अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ता है। हिन्दी भाषा हिन्दुस्तान का गौरव एवं अस्मिता की परिचायक है। विश्व हिन्दी दिवस का उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना, हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना, हिन्दी के लिए वातावरण निर्मित करना, हिन्दी के प्रति अनुराग पैदा करना, हिन्दी की दशा के लिए जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में स्थापित करना है। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था, इसीलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में हिंदी भी है। भारत के अलावा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और नेपाल सहित अनेक देशो में भी हिंदी बोली जाती है। विश्व भर में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन, शोध, प्रचार-प्रसार और हिंदी सृजन में समन्वय के लिए सक्रियताएं बहुत अधिक बढ़ी हैं। अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग की स्थापित हो रहे हैं। हिंदी को सूचना तकनीक के विकास, मानकीकरण, विज्ञान एवं तकनीकी लेखन, प्रसारण एवं संचार की आद्यतन तकनीक जैसे हिंदी के प्रचार हेतु वेबसाइट की स्थापना के विकास की दिशा में अनेक कार्य हो रहे हैं। इस बात से तनिक भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विश्व हिन्दी दिवस मनाने से विश्व में हिन्दी के विस्तार पर बहुत गहरा असर हुआ है।



हिंदी सदैव ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। दक्षिण प्रशांत महासागर क्षेत्र में फिजी नाम का एक द्वीप देश है, जहां हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। हिंदी आज एक वैश्विक भाषा बन रही है और लगातार इसका प्रचार और प्रसार बढ़ रहा है। अंग्रेजों सहित यूरोपियन साम्राज्यवादियों के भारत आगमन के बाद कई यूरोपीय भाषाओं के शब्द हिंदी का हिस्सा बने। कठिन परिस्थितियों के बावजूद हिंदी लगातार समृद्ध हो रही थी। हिंदी ने कई देशज शब्दों को भी अपनी मुख्यधारा में समाहित कर लिया। इससे उसका अभिव्यक्ति पक्ष और पुष्ट हुआ। हिंदी में रचे गए उच्च कोटि के साहित्य को विश्व पटल पर प्रशंसा मिली। भारत को एक सूत्र में पिरोने की बात की जाए तो गुलामी के दिनों में हिंदी ने यह भूमिका भी बखूबी निभाई थी। महात्मा गांधी स्वयं गुजरात से थे और वे अनेक वर्ष विदेश में रहे थे, लेकिन उन्होंने हिंदी और हिंदुस्तानी पर हमेशा बल दिया। हिंद, हिंदी और हिंदुस्तान एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे। आज एक स्वतंत्र भारत के नागरिक होने के हमारे गौरव में हिंदी की अस्मिता का भी एक बड़ा योगदान है।