बच्चों में चरित्र निर्माण के लिए श्रीमद्भगवद्गीता एक अद्भुत औषधि के समान है

श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान का भंडार है, अध्ययन मनन चिंतन व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है इसके आत्मसात करने से मनुष्य समाज राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व बोध से परिचित हो सकता है। बच्चों में चरित्र निर्माण के लिए श्रीमद्भगवद्गीता एक अद्भुत औषधि के समान है। आज मनुष्य सबसे ज्यादा कर्मशील है और श्री कृष्ण की गीता जो कर्मयोग के माध्यम से कर्म के रहस्य को समझती है। वह आज के वर्तमान जीवन में मनुष्य के लिए सबसे ज्यादा कारगर सिद्ध हो सकती है। ये हजारों साल पुराना ग्रन्थ हमें आज के आधुनिक जीवन में जीने के लिए नया दृष्टिकोण दे सकता है। जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में तो करता है, किन्तु जिसका मन इन्द्रिय विषयों का चिंतन करता रहता है। वह निश्चित रूप से स्वयं को धोखा देता है और मिथ्याचारी कहलाता है। श्रीकृष्ण कहते है-मनुष्य सबसे बड़े धूर्त हैं, जो अपने कार्य इन्द्रिय सुख के लिए करते हैं और वह जो अपने आप को योगी बताते हुए इन्द्रिय इन्द्रिय तृप्ति के विषयों की खोज में लगा रहता है। वह व्यक्ति निष्ठावान है, जो अपने मन के द्वारा इंद्रियों को वश में करता है और बिना आसक्ति के कर्मयोग करता है क्योंकि जो व्यक्ति स्वार्थ से रहित होकर अपने कर्म करता है वह अपने लक्ष्य को भी पार कर सकता है। एक गृहस्थ व्यक्ति भी अपने ईश्वर रुपी प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।



यह सर्वविदित है कि अच्छे या बुरे कर्मों के फल भी अलग अलग होते हैं और कोई भी फल मनुष्य को बाँध देता लेता है। इसलिए श्रीकृष्ण चाहते थे-अर्जुन गृहस्थ रहते हुए एक सेनानायक के कर्तव्य को भी पूरा करे क्योंकि तुम्हारा धर्म लड़ना है और तुम इस कर्म को बिना फल की चिंता किये हुए पूरे संलग्न होकर करो तो तुम्हें भी ज्ञान प्राप्त होगा और सुख दुःख के पार होकर परम सत्ता का भोग करोगे। कर्मयोग का अर्थ अपने कर्म को पूरी एकाग्रता के साथ पूर्ण रूप से करना है और कोई भी कार्य पूर्णता के साथ तभी सम्भव है जब उसके कुछ पाने की इच्छा न हो उसका क्या परिणाम होगा इस तरफ मन न ले जाकर पूरी एकाग्रता के साथ किया जाए जब इंसान अपना कर्म बिना आसक्त हुए करता है तो मनुष्य की सारी शक्तियां केन्द्रीभूत होती है और एक आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न करती है और इस आध्यात्मिक ऊर्जा से जो ज्ञान प्राप्त होता है ,उससे मनुष्य सुख दुःख से पार होकर परम आनंद को भोगता है। आज आवश्यकता की सभी शिक्षण संस्थाओं में श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को अनिवार्य किया जाय।  आज बच्चो एवं युवाओ में अवसाद,नकारत्मकता, नशा जैसी आदते जीवन को बर्बाद को कर रही है।बच्चो के जीवन की अनेक  समस्याओं का समाधान श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से हो सकता है।